Monday, 22 December 2014



रफ़्ता-रफ़्ता भोर हो गई.....
अलसाए सूरज ने जब अंगड़ाई ले खिड़की से झाँका,
झट शरमा के ढुलक पड़ी शबनम की बूंदे, सिक्त हँसी फूलों पे छाई, नम कलियों की कोर हो गई 
रफ़्ता-रफ़्ता भोर हो गई....

कहीं किसी के शीश महल पर उजली किरणें जब चमकी तब दमका सूरज....
उसी दमक की अंजुरी भर के चपल रश्मियाँ भाग किसी टूटे छाजन से जा टकराईं
छन छन करके बिखर गयीं घर में, आँगन में, गलियारे में....
तन में, मन में, आँखों में अंजोर हो गई |
रफ़्ता-रफ़्ता भोर हो गई.....

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